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बहुमत या गठबंधन

साल 1984 के बाद 2014 आया जब चुनावी इतिहास में एक बार फिर बहुमत राज आया। इंदिरा गांधी की मौत की बाद 1984 में हुए चुनाव में कंग्रेस मतो का बादशा बनकर सामने आयी। और 533 में सबसे ज्यदा 414 सीटें लाकर बहुमत के जादुई आंकड़े तक पहुँची। 30 सालों बाद 2014 में भाजपा ने पूर्ण बहुमत की नई कीर्ती गाथा का निर्माण किया और 543 सीटों में 284 सीटें हासिल की।
लम्बे इंतजार के बाद जब 2014 में भाजपा ने आस दिलाई तो अब 2019 पर भी नजरें टिकी है। महागठबंधन का बनना चुनावी दिशा में एक नया मोड़ है।
अगर बात बहुमत और गठबंधन सरकार कि करें तो पायेगें – बहुमत सरकार ऐसी सरकार है जिसमें फैसले लेने की पूरी आजादी एक पार्टी को मिल जाती है। इसके दो पक्ष है या तो यह सरकार देश हित में काम करती है या अपनी मनमानी करने लगती है। तो दूसरी तरफ गठबंधन सरकार कई पार्टीयों का जोड़ होती है। यहाँ भी दो पक्ष है या तो यह सरकार समाज के अलग-अलग सोच वाली पार्टीयों की सोच के साथ चलकर देश हित में काम करेगी या तो आपसी मतभेद में उलझकर रह जाएगी।
अगर इतिहास में जाखें तो हमें मिलेगा की बहुमत सरकार कई अधिक मजबूती से सरकार चलाती है। ऐसा इसलिए क्योकिं गठबंधन सरकार की अलग-अलग विचार आपस में मजबूरी का माहौल बना देती है। लेकिन केरल और पश्मि बंगाल के वामपंती सरकार मजबूती से उभरती दिखी है जो गठबंधन सरकार की ऐकता को दिखती है। क्योकिं इनकी विचारधारा एक दिशा में थी। तो दूसरी तरफ एक खास पार्टी को हराने के लिए बनाई गई गठबंधन न तो देश हित में होती है और न ही गठबंधन हित में।

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