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राष्ट्रप्रेम की अनवरत धारा से ओतप्रोत- भगत सिंह

राष्ट्रप्रेम की अनवरत धारा से ओतप्रोत भगत सिंह की शहादत का दिन है आज। 23 मार्च 1931 को राष्ट्रभक्त भगत सिंह अपनी माटी की आन की खातिर न्योछावर हो गए। युवाओं कि आवाज बनकर देश को वापस खुशहाल बनाने के लिए अंतिम सांस तक लड़े भगत। सुखदेव, राजगुरू, जतिन दास के पूरे सहयोग से भारत और भारतीयता की अमिट पहचान को सक्रिय करने में लग गए। न सिर्फ हिन्दुस्तान की आजादी के खात्मा पर यह युवा बल पूर्ण सक्रिय था। अक्रमकता पहचान थी , और कलम की धार शान थी । अपने विचारों को खुल कर कागज पर उखेरते थे भगत। उनकी शख्सियत उन्हें न सिर्फ भारत में नायक बनाती है अपितु पाकिस्तान भी आदर करता है।
शहादत को प्राप्त होने से पहले भगत सिंह दो सालों तक जेल में रहे। जेल में होती कई प्रताड़ानाओं और अग्रेंजो और भारतीय कैदियों के बीच भेदभाव के खिलाफ सुखदेव, राजगुरू और जतिन दास के साथ मिलकर भूख हड़ताल की । जोकि 116 दिनों तक चली। भूख हड़ताल के दौरान क्रगेंस अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू लाहौर जेल मिलने पहुँचे ।

भगत सिंह कहते है- यदि बहरों को सुनना है तो आवाज़ को बहुत जोरदार होना होगा जब हमने बम गिराया तो हमारा धेय्य किसी को मारना नहीं हमने अंग्रेजी हुकूमत पर बम गिराया था, अंग्रेजों को भारत छोड़ना होगा


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