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आत्म-निर्भर ही सर्वत्र पूजा

सच ही कहा था पंड़ित श्रीराम शर्मा आचार्य ने ’’अपनी प्रसन्ता दूसरों की प्रसन्ता में लीन करना ही प्रेम है’’। इसमें कुछ खोने को नहीं है जबकि पाने को ढेरो खुशियाँ और एक नई शुरूआत की प्रेरणा है। यह तभी संभंव है जब हम खुद को गले लगाना सिकेंगें। महात्मा बुद्ध का कथन है-‘‘सारे ब्रह्माण्ड में आप अपने प्यार के उतने ही हकदार है, जितना की कोई और ’’। खुद के प्रति जिम्मेदारी समझना तथा खुद को भली-भांति जानना ही खुद से प्रेम है । यह एक सुखद यात्रा है, जब आप स्वंय को अपनाते है । दूसरो के राय के मोहताज नहीं होते है। तब आप खुद को प्रेम से पूर्णतः भर लेते है । यह घमंड़ नहीं आत्म सम्मान की बात है । स्वंय से प्यार नजरिया बदलेगा और आप दूसरों को भी पूरी तरह प्यार देने में सक्षम हो जाएगें।
संसार की सर्वोतम शिक्षा वह है, जो मनुष्य स्वंय संसार में संघर्ष द्वारा प्राप्त करता है। आत्म-निर्भर ही सर्वत्र पूजा है ।

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