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आदर्शों के आदर्श : स्वामी विवेकानंद

युवा शब्द स्वयं में ही विश्व में सर्वश्रेष्ठ होने की अनुभूति दिलाता है यह बताता है कि आपके समक्ष कोई नहीं है कोई नहीं है जो आपके समान शौर्य रखता हो कोई नहीं है जो उसके सामान आत्मानुशासन के कांटों की शैया लगा कर सोता हो, लोहे जैसी शक्ति रखने वाले, अद्वितीय राष्ट्र प्रेम करने वाले, जोश के साथ होश रखने वाले, काल की चाल को बदलने वाले का नाम ही युवा है।

सबसे पहले यह जान लेना आवश्यक है युवा होने का आशय या संबंध किसी भी प्रकार से शारीरिक अवस्था या कागज पर लिखी एक गिनती से नहीं है युवा वह है जो प्रेरक इतिहास रचता है, युवा वह है जो राष्ट्र के प्रति बलिदान की आस्था रखता है, युवा वह है जो समस्याओं का समाधान निकलता है, युवा वह है जो नीतियों की रक्षा में अनीतियों से लड़ता है फिर चाहे वह धनबल से हो,आत्मबल से हो या बाहुबल से , “हर बल से सबल रहने वाले का नाम ही युवा है”।

ये सभी कुछ स्वामी विवेकानंद की सोच और विचार के ही अवयव हैं स्वामी जी का एक मात्र ही संकल्प था की इस राष्ट्र को और इसकी शक्ति को अर्थात युवाओं को इतना सबल बनाया जाए कि उन्हें फिर किसी और संबल की आवश्यकता ही ना पड़े उनका कहना था कि “उठो और जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि तमु अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते”.

स्वामी विवेकानंद स्वयं उन युवाओं में शामिल थे जिन्होंने राष्ट्र की संस्कृति एवं सभ्यता को उस समय में भी सहेज कर रखा जब हमारे भारतवर्ष की संस्कृति और सभ्यता पर एक नहीं वरन् कई संस्कृतियां हावी होने का प्रयास कर रही थीं
याद कीजिए स्वामी विवेकानंद का वो भाषण जो उन्होंने शिकागो के धर्म सम्मेलन में दिया था और गर्व करिए अपने उस संस्कृति एवं सभ्यता के महानायक पर जिसने की समूची दुनिया के सामने भारतीय ज्ञान की पताका को सबसे ऊपर लहराया

प्रिय बहनो और भाइयो!

आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की ओर से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिंदुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं।

मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी है, जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देश भारत से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है।

हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है।

मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इजराइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी।

मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है। भाइयों, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा, जिन्हें मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा प्रतिदिन दोहराया जाता है।

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।। अर्थात: जिस तरह अलग-अलग स्रोतों से निकली विभिन्न् नदियां अंत में समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं। वर्तमान सम्मेलन, जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है कि ‘जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं”।

सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं, हठधर्मिता और इसके भयानक वंशज लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं।

अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्न्त होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

“याद रखिये युवा उस परिभाषा का नाम है जो हर पूर्वाग्रहित परिभाषा को बदलना जानता है”
स्वामी विवेकानंद ने अपने समय में हर परिभाषा एवं मिथक को तोड़ा आज की पीढ़ी की नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है की वह भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चलकर दुनिया के उस भ्रम को तोड़ दे जो आज युवाओं के विषय में बना लिया गया है

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