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सफलता पाने व पचाने का रहस्य

आप ही दुनिया में यूनिक है, यह भ्र्म है बल्कि आप भी यूनिक है, सत्य है. भ्र्म अंहकार में व्यक्त होता है और सत्य अभिमान में. अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि अंहकार व अभिमान में अंतर क्या है ? जवाब बड़ा सरल है जो आपके विकास को रोकता है, सीमाबद्ध करता है, वह अहंकार या घमंड है. जो आपको व्यापक बनाता है. जहां आप है, उससे आगे की यात्रा का रास्ता खोलता है, वह अभिमान है.

आज अधिकतर लोग अहंकार के नशे में चूर रहते है. थोड़ी सफलता क्या मिल गई, आसमान से बाते करने लगते है और देखते-देखते अहंकार उनकी सफलता पर हावी हो जाता है, इस तरह से वे अपने को वहीं तक सीमित कर देते है. इस अहंकार की आदत से छुटकारा पाने का जो कैप्सूल है वह अध्यात्म के नाम से जाना जाता है. जिसे कोई भी अपना सकता है. अध्यात्म की सबसे खास बात है कि यह किसी धर्म, सम्प्रदाय, जाति की सीमा से बंधा नहीं है, इसलिए इसे हर कोई अपना सकता है और अपने को अहंकार जैसी तमाम बुरी आदतों से बचा सकता है. अध्यात्म का अर्थ अपने आप को जानने से है, अपनी क्षमताओं से परिचित होने से है, होमो सेपियंस से मनुष्य बनने से है. यह सब कैसे होगा ? जब आप अपना निरतंर व नियमित अवलोकन करेंगे, तब आप अपने अंदर निहित संभावनाओं को पहचान पाएंगे. परिणामस्वरूप आप जिस किसी भी काम को करने में हाथ आजमाएंगे, उसमें सफलता प्राप्त करेंगे और उस सफलता को पचाने में भी समर्थ होंगे.

अब आप सोच रहे होंगे कि अपना निरतंर व नियमित अवलोकन करें कैसे? इसके कई तरीके हो सकते है. मेरे हिसाब से आत्मबोध व तत्त्वबोध अपने अवलोकन की बेहतर विधि है, जो युगऋषि वेदमूर्ति पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा दी गई है. जो इस प्रकार है-

“प्रातः काल आँख खुलने से लेकर चारपाई में नीचे उतरने में थोड़ा समय लगता है. इसी समय को नया प्रभात,नया जीवन मान कर बिस्तर पर पड़े-पड़े ही आत्मबोध की साधना करनी चाहिए.

इसी प्रकार रात को बिस्तर पर जाने से लेकर नींद आने के बीच में जो थोड़ा समय मिलता है उसे तत्वबोध की साधना में लगाना चाहिए.

आत्मबोध अर्थात् हर दिन नया जन्म. तत्वबोध अर्थात् हर रात को नया मरण. जन्म और मरण के साथ जुड़ी हुई विचारणा पर सच्चे मन से विचार करने पर मनुष्य अपने भीतर एक नई हलचल अनुभव करता है और अपने क्रियाकलाप को, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाकर एक प्रकार से आत्मिक कायाकल्प की दिशा में कटिबद्ध और अग्रसर होता है.”

इस प्रकार आप आत्मबोध व तत्वबोध की साधना से अपने को बुरी आदतों से बचाकर सफलता के सोपानों पर बढ़ सकते है.

राजू राम

(राजस्थान)

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